Saturday, October 18, 2008

मां होती तो क्या होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
ज़मीं होती आसमां होता
आंचल की छांव घनी होती
बेगाने से इस बेरहम शहर में
कोई कोई अपना होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
नहीं कुछ बुरा सब भला होता
सपनों का गांव बसा होता
वीराने से इस तपते शहर में
अपना भी कोई निशां होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
जगमग सारा शमां होता

सूरज का घर बना
काले कलूटे बेशरम शहर में
दूश्मन के दिल में वफ़ा होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
चुल्हे पर बर्तन चढा होता
दाल रोटी पकी होती
तडपते बिलखते भूखे शहर में
शायद ही कोई भूखा होता

सचमुच
मां होती तो क्या होता!

4 comments:

Unknown said...

really touching

ashish said...

Really very good blog.

yun hi ek khayal mein said...

mein sochta hoon ki maa hoti to kya hota jab maa ke bina itna kuch hota hai . behtreen koi saani nahin .

Unknown said...

yaar everything is very well written but at places i felt language is incorrect..... perhaps m wrong... but well written.