सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
ज़मीं होती आसमां होता
आंचल की छांव घनी होती
ज़मीं होती आसमां होता
आंचल की छांव घनी होती
बेगाने से इस बेरहम शहर में
कोई न कोई अपना होता
सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
नहीं कुछ बुरा सब भला होता
सपनों का गांव बसा होता
वीराने से इस तपते शहर में
अपना भी कोई निशां होता
सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
जगमग सारा शमां होता
सूरज का घर बना
काले कलूटे बेशरम शहर में
दूश्मन के दिल में वफ़ा होता
सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
चुल्हे पर बर्तन चढा होता
दाल रोटी पकी होती
कोई न कोई अपना होता
सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
नहीं कुछ बुरा सब भला होता
सपनों का गांव बसा होता
वीराने से इस तपते शहर में
अपना भी कोई निशां होता
सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
जगमग सारा शमां होता
सूरज का घर बना
काले कलूटे बेशरम शहर में
दूश्मन के दिल में वफ़ा होता
सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
चुल्हे पर बर्तन चढा होता
दाल रोटी पकी होती
तडपते बिलखते भूखे शहर में
शायद ही कोई भूखा होता
सचमुच
मां होती तो क्या होता!
शायद ही कोई भूखा होता
सचमुच
मां होती तो क्या होता!
4 comments:
really touching
Really very good blog.
mein sochta hoon ki maa hoti to kya hota jab maa ke bina itna kuch hota hai . behtreen koi saani nahin .
yaar everything is very well written but at places i felt language is incorrect..... perhaps m wrong... but well written.
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