Friday, September 11, 2009

बूंदों की शराब

ऐ दिल्ली,
चलो बारिश बोतलों में भरे
और बूंदों की शराब बनाये
कुछ ख्वाब तुम कुछ हम सजाये
आन्धियां अंगीठी पे सेंके
और तूफानों का कबाब बनाये
दायां तुम और बायां हिस्सा हम चखे
दो पैसे की ख्वाहिशें खरीदें
आधा-आधा का हिसाब बनाये
रात भर सांसों की गुफ़्तगू हो
सेर भर खामोशियां टकराये
रात भर रात की किताब बनाये
छोटे-नशीले, नीले-पीले किस्से हो
खुद हो गुलाम मेम को
मेमसाब बनाये
बूंदें बरतनों में परोसें
फुहारें चेहरों पे मले
माहताब बनाये
बारिश बोतलों में भरे
बूंदों की शराब बनाये
ऐ दिल्ली.

6 comments:

अपूर्व said...

कितने नये और खूबसूरत बिम्ब और दृश्य गढ़े हैं आपने इस कविता मे..अद्भुत..
बधाई

Udan Tashtari said...

वाकई, बहुत अद्भुत रचना.

संजय तिवारी said...

आपकी लेखन शैली का कायल हूँ. बधाई.

विवेक रस्तोगी said...

बहुत शरारतें भी लिख डाली हैं, अच्छी कविता।

हरकीरत ' हीर' said...

चलो बारिश बोतलों में भरें
और बूंदों की शराब बनाएं

आपका यकदम से आना और यूँ बारिश को नशेमन कर जाना अच्छा लगा ....!!

Unknown said...

bada nashila hai..



www.anuragbuxar.blogspot.com