Wednesday, May 12, 2010

यादगार पात्र होने की चाह ज़िन्दगी.

मेले में बिक रहे किसी
बैलून, चश्मे, लाई-पकौडी
झूला, सेवई, जलेबी
रास्ते का सबसे घना पेड
फट चुकी किताब
लाल रंग
हिन्दी फ़िल्मों का 'राज', 'विजय'
बंगाली बाबा का जादू
हाशमी दवाखाना की शीशी
कमजोरी भगाने वाली खुराक
मोटा वाला बैंक अकाऊंट
ज़ीरो साईज़ टेंशन
खाके सोने वाली दिनचर्या
नदी-नाले की ठंडी हवा
और
किसी कहानी की पूंछ पकडके
कोई यादगार पात्र होने की चाह
ज़िन्दगी.

1 comment:

Unknown said...

wah hozor wah kya baat hai..