Sunday, December 21, 2008

सिफर

तुम्हारे लिये मैंने कुछ नहीं खरीदा

ईश्वर को भी आजतक कुछ नहीं दिया

मां भी वंचित है मेरे द्वारा कुछ भी पाने से,

तुम सबों से अभी तक लेता ही आया हूं,

ममता की छांव, मां की आंचल से,

ईश्वर ने दिया है ये जीवन,

और तुमने, तुमने दिया है प्रेम,

जीने की वजह.

सोचता हूं लौटाऊंगा,

इसके एवज में कुछ

पर इसे बदले की बात मान

खामोश हो जाता हूं,

सच ये भी है कि मेरे बटूएं में कुछ नहीं है

सिर्फ़ एहसास है

मेरे पास यही है कि

मुझे मां, ईश्वर और तुमसे प्रेम है.

6 comments:

Varun Kumar Jaiswal said...

जिसके पास प्रेम है उसके पास सिफ़र तो कुछ भी नही |
अच्छा लिखते है आप |
लिखते रहें |

Unknown said...

really gud!

Anonymous said...

aap bahut acha likhte hai mujhe pata nahi tha............... humare upar bhi kuch likhiye tab jaane
waiting........................

Alankritaa said...

Truly inspiring! blessed to knw a talented person like u:) sky is ur limit.

श्रद्धा जैन said...

bahut achha flow aur soch aapki

Rajeev Kumar said...

this appears to be my story. rather everyone's story