समेटूंगा, तुम्हारे दिये सारे गम, बेरूखी, बेरहमी
दिन-रात 'तेरा-मेरा' करना, बात-बात में दूरी का,
फ़र्क का अहसास कराना,
जमा करता रहूंगा,
हर बात में तुम्हारा 'क्यों?' कहना,
थोडी हंसी भी छिपाकर-चुराकर रख लूंगा,
तुम्हारे कहे 'क्यों?', 'तेरा-मेरा' और 'नहीं',
बोरियों में भर लूंगा,
जब
खतम हो जायेगा सबकुछ,
तुम्हारा असर तुम्हारा नशा
तब तुम्हारे दिये
गम, बेरूखी, बेरहमी, 'तेरा-मेरा',
'क्यों?', 'नहीं' और
तुम्हारी हंसी को धोकर, ऊबालकर,
धूप में सुखाऊंगा,
पीसकर-छानकर भस्म(चूरन) बनाऊंगा,
सुबह गर्म पानी के साथ, रात में दूध के साथ लूंगा
तुम फिर असर करोगे, उतरोगे
आत्मा में रूह के भीतर.
9 comments:
बहुत बेहतरीन लिखते हो भाई ....भावनाओं को अच्छी तरह बयाँ करते हो
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
भाईजान ठेठ देसी लिखते हो। वैसे हर किसी का अपना अंदाज होता है। आप अपने देसी अंदाज को कभी मत छोडऩा। यही आपकी पहचान है। बहुत अच्छे।
तेरा मेरा के चक्कर में कट जाये दिन रात।
पीस के खाना गम बेरहमी खूब कही है बात।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.
shyamal ji shukriya. aapka.
आपके लिखने का अंदा़ज़ सबसे अलग है। इसे बनाए रखें
रात में दूध के साथ लूंगातुम फिर असर करोगे
kya khoob likha hai.
दवा का कोई नया फार्मूला है आपके पास .....!!
i don't hv words....tareef ke liye shabd nahi hai..bas aese hi likhte rehna..chahe kitne hi bade lekhak ban jao par apni masumiyat ko mat khona..realy likd all of ur work al d best bles u......
nami..
Great Yaar Bahoot Khub likha hai.
Post a Comment