Friday, August 21, 2009

दूल्हनियां

उछाल मारती उम्मीद से अब कोई भी उम्मीद बेमानी है. लाख रगड के, दिमाग के कोई भी पेंच खोल के, कुछ ऐसा हो जाये कि लोग नाम लेने लगे एक बार, बस. गोल, चाकर चाहे तिरपिटाह ढंग की कोई गोली मदद नहीं करती ऐसे में. मन रोज़ इस लालच से दौड लगाता है कि अबकी बार त फर्स्ट हो ही जायेंगे. कै रंग के पुडिया भी फांक लिया. फिर भी बात ओतने के ओतने. उतना ही ज़ोर लगाना पडता है भोरे भोरे. एस्नो पौडर लगयला के बाद, हाफ़ शेरवानी पहनने के बाद भी दूल्हा तो क्या, सहबोलिया भी नहीं बन पाया हूं लाईफ़ का. परयासरत हूं. फिर भी. कभी निमंत्रण पत्र हाथ लग गया किसी लगन तो, बाराती तो बन ही जाऊंगा. फिर ढोल, बाजे तमाशे. ठीन चक ठीन चक...., आज मेरे यार की सादी है...., आये हम बरियाती बारात लेके, जायेंगे तुम्हें भी अपने साथ लेके.... नाचते गाते हुए पहूंचूंगा. लोग सब मस्ती में लोटा रहे होंगे. ...कौफ़ी, कोको कोला, चाट, शरबत पीते लोगों के बीच उठके मार दूंगा दूल्हा को. ....ठांय.ठांय. और बिदागरी कराके ले आऊंगा अपने घर. लाईफ़ को. हा...हा..हा...

1 comment:

Unknown said...

kya sahi likhe ho bhai:) Tumme to kuch baat hai.