धूप जैकेट पहनके आता
धूप की गहराई
अब कम हो गई है
सर्दी की डर से
भागी फिरती है
शाम पसर जाती है
दिनसे ही.
कोहरे की शोर
तडके शाम से
भोर तक.
हाथ में थामे
चाय की प्यालियों से
धुआं निकलता है.
गर्दन में शाल लपेटे
या गुलबन्द बांधे
बसों मे लोग.
कोहरों की शरारतों के
दिन शुरू हुए.
दो-दो रजाईयों वाली
सर्दी की रात
नया साल नई दिल्ली.
5 comments:
सुना है बड़ी ठंड हो रही है उस पार!!
बहुत खूब , .....
रितुराज दिल्ली की सर्दी को बेहतरीन तरीके से उतारा है
सुन्दर अभिव्यक्ति शुभकामनायें
very nice poem
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