Friday, December 25, 2009

सूरज अब नहीं नहाता

सूरज अब नहीं नहाता
धूप जैकेट पहनके आता
धूप की गहराई
अब कम हो गई है
सर्दी की डर से
भागी फिरती है
शाम पसर जाती है
दिनसे ही.
कोहरे की शोर
तडके शाम से
भोर तक.
हाथ में थामे
चाय की प्यालियों से
धुआं निकलता है.
गर्दन में शाल लपेटे
या गुलबन्द बांधे
बसों मे लोग.
कोहरों की शरारतों के
दिन शुरू हुए.
दो-दो रजाईयों वाली
सर्दी की रात
नया साल नई दिल्ली.

5 comments:

Udan Tashtari said...

सुना है बड़ी ठंड हो रही है उस पार!!

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब , .....

अबयज़ ख़ान said...

रितुराज दिल्ली की सर्दी को बेहतरीन तरीके से उतारा है

निर्मला कपिला said...

सुन्दर अभिव्यक्ति शुभकामनायें

Anonymous said...

very nice poem