मां,
आशा है कि तुम ठीक होगी.
मेरा ये है कि,
जब तक सुबह बूढी नहीं होतीनींद अपनी पूरी उम्र जीती है.
हर सुबह
यहां की सर्दी को
गर्म पानी से पीटता हूं.
गुनगुने पानी की धार
और
दूबली हो चुकी धूप
तुम्हारी बात मानती होगी.
धड-फड तैयार होता हूं.
पर मां,
आफिस फिर भी
वक्त पर पहुंचता हूं.
आफिस पहुंचकर
मेरी भूख
धरमेन्दर की चाय और मठ्ठी की
शिकार हो जाती है.
कुछ फोन कौल निपटाकर
खाना खाता हूं.
देर रात घर लौटकर
खाना बनाता हूं.
रात को सोते वक्त
दोनों पैरों में
जुराबें पहन लेता हूं.
अधरतिया तक करवटों के
लफ़डे होते है
लोरियों के दिन लद गये
पता है.
मां मुझे याद है
मैंने कहा था
मैं दिल्ली जाऊंगा.
4 comments:
एक आज्ञाकारी पुत्र के रूप में लिखी गई बेहद भाव पूर्ण कविता, माँ को नमन है..बढ़िया रचना बधाई
बहुत भावपूर्ण रचना.
बहु सुन्दर व भावपूर्ण रचना है।धन्यवाद।
KYA LIKHOON...IS KHAT ME APNI BHAAVNAON KI SUNDAR ABHIVYAKTI KI HAI...!DINCHARYA KI SAMPOORAN VYAKHYA BHI...! CHAND PANKTIYON ME MAA KO SAB KUCH KAHA DAALA..!
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