Thursday, February 11, 2010

अपने अपने हिस्से की धूप

हम समेटे अपने अपने हिस्से की धूप
अपने हक की बारिशें
लगाये फांट बगीचे में उगे
आम और अमरूद के पेडों का

अपने अपने हिस्से का
आटा गूंथे, पूडी तले
चवन्नी डाले अपने अपने गुल्लक में
एक बिस्तर पर बांटे करवटों को

अपने अपने हिस्से की चांदनी से रौशन हो
अगल अलग ख्वाहिश पे मरे
हमारा खुदा, भगवान हिस्सों में हो
कबूतरों के घोंसले दोनों तरफ हो अलग

हमारी आसुंओं का स्वाद हो जुदा
तुम्हारी हंसी महंगी, मेरी सस्ती हो
अलग अलग हो रूह की शक्ल
और
बिल्कुल अलग हो रगों में दौडता खून.

उफ्फ!

जाने किस घडी सोया था,
मेरे शब्द कहां गये
और
मेरी अक्ल कहां गई
अब नहीं आती कभी करीब
मेरी सारी कवितायें
विदेश चली गई है. उफ्फ!

Monday, February 8, 2010

तकदीर इतनी तो बेरहम हो मुझ पर

तेरे शहर में कुछ दिन ज़िन्दा रहूं
तेरा इतना तो रहम हो मुझ पर
खुदा का नाम तेरे बाद आये
तेरा इतना तो करम हो मुझ पर

वो दीवार गिरे जो तुमने उठाये हैं
वो आग बुझे जो तुमने लगाये हैं
किसी दिन बारिश हो इस वीराने में
आंखों से इतनी रमझम हो मुझ पर

वो अपने घर में, मैं मैकदे में रहूं
तकदीर इतनी तो बेरहम हो मुझ पर

Sunday, February 7, 2010

धीरे धीरे

रातें काली,
सफ़ेद दोपहर,
सूरज आता पुरब से
जाता पश्चिम,
आसमां ऊपर
नीचे जहां,
खाने पीने का समय सही,
फिर भी,
दिल का घटता वजन
सोचता हूं,
कहीं तुम्हारे पास तो नहीं जा रहा
धीरे धीरे.

Saturday, February 6, 2010

आज की रात चांद को नहलाया जाये

ज़ख्म थोडा थोडा दिखाया जाये
आज साथ साथ बतियाया जाये
न तुम मेरे हुए न वो तुम्हारा
पुराने गम को हंसके भुलाया जाये

बेच के नीयत, जमीर दूकानों में
कुछ कुछ बाज़ार से कमाया जाये
न तुम भूखे रहो न हम भूखे रहे
दाना डालके चिडियां फंसाया जाये

जहां सिर्फ़ तुम रहो और हम रहे
सितारों में चलके घर बनाया जाये
हो रौशन चांद की रात झक सफ़ेद
आज की रात चांद को नहलाया जाये

Thursday, February 4, 2010

तुम प्यार क्यों नहीं करते?

जबकि
तुम्हारे लिये तारों की बारात आ सकती है,
फूलों से खूश्बू,
हवायें सा रे गा मा गा सकती है,
तुम्हारे वास्ते बातों की कई किताबें छप जाये,
बारिश की पानी से कौफ़ी बन सकती है,
सारी रातें, सारे दिन तुम्हारे नाम हो सकते हैं,
छोटी टोकरी में सूरज समा सकता है,
सर्दी तुमसे कोसों दूर रह सकती है,
सांस के चप्पे-चप्पे पे तुम दस्तखत कर सकते हो,
नसों में तुम्हारे नाम का लहू दौड सकता है,
तुम्हारे लिये जां भी चली जाये,
तुम प्यार क्यों नहीं करते?

Tuesday, February 2, 2010

विचार टिकता नहीं.

कभी कोई विचार
टिकता नहीं
छोटे से दिमाग के हर कोने में
खलबली सी चले है
कल ही एक बडा विचार पैदा लिया था
आज किसी कोने में दफन है
कई चीजें एक साथ करने का विचार
मेला देखने का,
लाल किला घूमने का,
चांदनी चौक की रबडी,
मूली परांठा, खुरचन परांठा, रायता,
किताबें खरीदने का,
दौडे जाये, दौडे जाये
बिन पहिया, बिन पेट्रोल
मन,
इंडिया गेट के पार
मन स्थिर कब होता है?
तब
जब काम करते है,
थकते है, बतियाते है,
या
तब जब हम सोते है?
कभी कोई विचार
टिकता नहीं.