Sunday, February 7, 2010

धीरे धीरे

रातें काली,
सफ़ेद दोपहर,
सूरज आता पुरब से
जाता पश्चिम,
आसमां ऊपर
नीचे जहां,
खाने पीने का समय सही,
फिर भी,
दिल का घटता वजन
सोचता हूं,
कहीं तुम्हारे पास तो नहीं जा रहा
धीरे धीरे.

1 comment:

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत खूब!!बढिया लिखा है...