सलाम करता चलूं!
खूश्बू जैसे शब्द खिले हैं.
Sunday, February 7, 2010
धीरे धीरे
रातें काली,
सफ़ेद दोपहर,
सूरज आता पुरब से
जाता पश्चिम,
आसमां ऊपर
नीचे जहां,
खाने पीने का समय सही,
फिर भी,
दिल का घटता वजन
सोचता हूं,
कहीं तुम्हारे पास तो नहीं जा रहा
धीरे धीरे.
1 comment:
परमजीत सिहँ बाली
said...
बहुत खूब!!बढिया लिखा है...
February 8, 2010 at 12:14 AM
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1 comment:
बहुत खूब!!बढिया लिखा है...
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