Sunday, July 19, 2009
बरखा
Friday, June 12, 2009
तेरा-मेरा, क्यों?, नहीं
समेटूंगा, तुम्हारे दिये सारे गम, बेरूखी, बेरहमी
दिन-रात 'तेरा-मेरा' करना, बात-बात में दूरी का,
फ़र्क का अहसास कराना,
जमा करता रहूंगा,
हर बात में तुम्हारा 'क्यों?' कहना,
थोडी हंसी भी छिपाकर-चुराकर रख लूंगा,
तुम्हारे कहे 'क्यों?', 'तेरा-मेरा' और 'नहीं',
बोरियों में भर लूंगा,
जब
खतम हो जायेगा सबकुछ,
तुम्हारा असर तुम्हारा नशा
तब तुम्हारे दिये
गम, बेरूखी, बेरहमी, 'तेरा-मेरा',
'क्यों?', 'नहीं' और
तुम्हारी हंसी को धोकर, ऊबालकर,
धूप में सुखाऊंगा,
पीसकर-छानकर भस्म(चूरन) बनाऊंगा,
सुबह गर्म पानी के साथ, रात में दूध के साथ लूंगा
तुम फिर असर करोगे, उतरोगे
आत्मा में रूह के भीतर.
Sunday, June 7, 2009
बनकर फूल खिलो
बनकर फूल खिलो गुलशन में, डरकर तुम क्या पाओगे
जो पाया है बांट दो सबकुछ, लेकर तुम क्या जाओगे
हंसते खिलते चेहरो से, दिल का दर्द मिटाओगे
बांटोगे जो बबूल के बीज, बेर कहां से पाओगे
खुशी के दीप जलाकर तुम, गम की रात भगाओगे
सूरज को दिखा के राह, नया सवेरा लाओगे
बनकर बादल आसमां में, जो तुम छा जाओगे
पड के बून्द जमीं पे तुम, सबकी प्यास मिटाओगे
बडे न बनना खजूर जैसे, ऊंचे ही रह जाओगे
खिलोगे जो गुलाब बनके सबका आंगन सजाओगे
तुमसे होगी जवां महफ़िलें, गीत गज़ल जो गाओगे
खुशी बांटके दर्द जो लोगे, सबकी दुआयें पाओगे
हिम्मत से ही तो दुनिया में, सबने जग को जीता है
मन में विश्वास रखोगे तो, तुम भी जीत जाओगे
बनकर फूल खिलो गुलशन में, डरकर तुम क्या पाओगे
Monday, April 20, 2009
ऐसी तैसी
दीवारों की ऐसी तैसी, सरकारों की ऐसी तैसी
खादी पहन जो देश को लूटे, गद्दारों के ऐसी तैसी
साहूकारों की ऐसी तैसी, पहरेदारों की ऐसी तैसी
बच्चे जहां भूखे मरे, दूकानदारों की ऐसी तैसी
बाज़ारों की ऐसी तैसी, हज़ारों की ऐसी तैसी
मां जिनसे बेटा खो दे, हथियारों की ऐसी तैसी
परिवारों की ऐसी तैसी, रिश्तेदारों की ऐसी तैसी
मां की आंख में आंसू जो दे, ईमानदारों की ऐसी तैसी
नज़ारो की ऐसी तैसी, उन प्यारों की ऐसी तैसी
होठ पे हंसी दिलमें खंज़र, कलाकारों की ऐसी तैसी
सितारों की ऐसी तैसी, बहारों की ऐसी तैसी
दिल टूटे जिस दिल्ली में, दिलदारों की ऐसी तैसी.
Tuesday, February 10, 2009
हर दिन नया मिलोगे.
क्यों
एक टोक भर देने से
बिखर जाते हो दूर दूर तक कई दिशाओं में
फिर दौड दौड के एक एक तुमको चुनता हूं
न धूप देखता हूं न छांव न शहर न गांव
बडी संजीदगी से ढूंढके
एक एक तुमको इकठ्ठा करता हूं
धो पोंछके सुखाके बातों की ओट लगाके
प्यार की लेई से चिपकाता हूं
पूरा एक करता हूं तुमको
फिर,
चंदन का टीका लगाके, अगरबत्ती दिखाके मनाता हूं
बात कह भर देने से
मुंह बना लेते हो, बिगड जाते हो
बिखर जाते हो दूर दूर
तुम ऐसे क्यों हुए
जो भी हो, तुम ऐसे ही रहना
बार बार बिखरना
मैं बार बार इकठ्ठा करूंगा
हर दिन नया मिलोगे तुम मुझे।
Wednesday, January 7, 2009
दो लोग
दोनों में चादर की खींचतान
बीच में थोडी सी खाली जगह
कपडों के भीतर से शरीर में पहुंचती ठिठुरन
धुंध और कोहरा ऐसा
जैसे शहर के लोगों ने
बिल्कुल सोंधी सी खूश्बू कोहरे की
कोहरे के डर से सूरज नहीं दीखता
छिपकर कहीं दूर से देखता कोहरे को
कोहरे में लिपटी दिल्ली में
दो लोगों के बीच चादर की खींचतान
कभी इस तरफ कभी उस तरफ,
ये शहर दिल्ली है.