कहने को तो उम्र बढता है
और दिन गुजरता है रोज़
पर सही माने तो
सब समय की जालसाजी है
चक्कर पे चक्कर है
गोल गोल दुनियां
समय गुजर रहा है
एक एक दिन करके आगे.
वक्त बीतता है कहके
मुन्ने की हाथ में
झुनझुना थमाया गया है
आज रविवार, कल सोमवार,
फिर कल मंगलवार कहके
दिन को गुजरने दिया जाता है
और ऐसे ही वक्त को
मौका मिलता है आगे जाने का.
वक्त आगे निकलता चलता
उम्र बढती जाती तो
शनिवार को खत्म होके
दिन फिर रविवार ही क्यों? आता.
वक्त की कलाकारी है सब.
2 comments:
वक्त की कलाकारी है सब.
LAJWAAB RACHNA
baat to sahi ki hai aapne..sochne vali
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