Tuesday, November 10, 2009

रिश्ते सब निठल्ले हो गये

रिश्ते सब निठल्ले हो गये
फुल के ये रसगुल्ले हो गये
रंग बिरंगे किस्से थे जो
सब के सब काले हो गये

रिश्ते सब निठल्ले हो गये

मौडर्न घर की मुनिया हो गई
काली-काली चंदनियां हो गई
कट गई खुशियों की पतंग
गम की बल्ले-बल्ले हो गये

रिश्ते सब निठल्ले हो गये

दोस्ती यारी प्यार मोहब्बत
हंसने भर की बातें हो गई
टूट रहा है सब कुछ तेज़
रिश्ते हौले - हौले हो गये

रिश्ते सब निठल्ले हो गये

घर की दुनियां उजड रही है
मकां आग सी फैल रही है
बेबी, बिट्टू, काकी का घर
गुम सारे मोहल्ले हो गये

रिश्ते सब निठल्ले हो गये
फुल के ये रसगुल्ले हो गये



6 comments:

अर्कजेश said...

:)सही बात है ।

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब जनाब ।

निर्मला कपिला said...

बैलकुल सेही कहा है रिश्ते सब निठल्ले ही हो गये हैं शुभकामनायें

Anonymous said...

21वीं सदी में रिश्ते वाकई कुछ ऐसे हो गए हैं।

Unknown said...

bhai gajab

संजय भास्‍कर said...

LAJWAAB SIR JI