उतर आती है.
चाय की तलब
चाय की तलब
दिन भर लगी रहती है.
शाम होते ही
रोआं सिहरने लगता है.
जैकेट को लिहाफ़ बनाने की नाकाम कोशिशें
चलती है दिन भर.
उठो तो
बैठने का जी नहीं.
बैठो तो
उठने का मन नहीं करता.
किसी कब्र में
लेटने को जी करता है.
इन कोहरों को
कोई टोपी पहनाये
रगों में खून के बदले
सर्दी दौड रही है आजकल.
दिल्ली.
1 comment:
बहुत सुन्दर ।
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