Wednesday, January 13, 2010

सफ़ेद-सफ़ेद ओस

सफ़ेद-सफ़ेद ओस
उतर आती है.
चाय की तलब
दिन भर लगी रहती है.
शाम होते ही
रोआं सिहरने लगता है.
जैकेट को
लिहाफ़ बनाने की नाकाम कोशिशें
चलती है दिन भर.
उठो तो
बैठने का जी नहीं.
बैठो तो
उठने का मन नहीं करता.
किसी कब्र में
लेटने को जी करता है.
इन कोहरों को
कोई टोपी पहनाये
रगों में खून के बदले
सर्दी दौड रही है आजकल.
दिल्ली.


1 comment:

Mithilesh dubey said...

बहुत सुन्दर ।