जंग लगे चुल्हे से शुरु हुआ
सफ़र घर होने का.
एक थाली खरीदा खुद के लिये
एक किसी अचानक आ जाने वाले के लिये
एक तसली, दो तीन चम्मच
दो तीन बडे-बडे डिब्बे
चावल, दाल और आटे के लिये.
दो कूकर
एक गैस सिलिन्डर खरीदा ब्लैक में
दो विम की टिकियां
थोडी सी चीनी, इलायची
दूध का पाउडर
डब्बे-डिब्बियों को सजाके और
माचिस की तिलियों के सहारे
बनाया था
घर
अब छोड रहा हूं.
1 comment:
चित्र बन जाती है कविता...वास्तविकता ओढ़कर बैठ जाती है ठीक आंखों के सामने।
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