टिकता नहीं
छोटे से दिमाग के हर कोने में
खलबली सी चले है
कल ही एक बडा विचार पैदा लिया था
आज किसी कोने में दफन है
कई चीजें एक साथ करने का विचार
मेला देखने का,
लाल किला घूमने का,
चांदनी चौक की रबडी,
मूली परांठा, खुरचन परांठा, रायता,
किताबें खरीदने का,
दौडे जाये, दौडे जाये
बिन पहिया, बिन पेट्रोल
मन,
इंडिया गेट के पार
मन स्थिर कब होता है?
तब
जब काम करते है,
थकते है, बतियाते है,
या
तब जब हम सोते है?
कभी कोई विचार
टिकता नहीं.
2 comments:
यही तो विचारों की प्रवृति है..बढ़िया रचना.
मनोभावो को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं। बढिया रचना है। बधाइ।
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