Saturday, February 6, 2010

आज की रात चांद को नहलाया जाये

ज़ख्म थोडा थोडा दिखाया जाये
आज साथ साथ बतियाया जाये
न तुम मेरे हुए न वो तुम्हारा
पुराने गम को हंसके भुलाया जाये

बेच के नीयत, जमीर दूकानों में
कुछ कुछ बाज़ार से कमाया जाये
न तुम भूखे रहो न हम भूखे रहे
दाना डालके चिडियां फंसाया जाये

जहां सिर्फ़ तुम रहो और हम रहे
सितारों में चलके घर बनाया जाये
हो रौशन चांद की रात झक सफ़ेद
आज की रात चांद को नहलाया जाये

4 comments:

निर्मला कपिला said...

ांच्छी लगी आपकी रचना शुभकामनायें

गगन शर्मा, कुछ अलग सा said...

मौसम के मद्दे नजर थोड़ी एहतियात की जरुरत है :)

Fauziya Reyaz said...

bahut khoob, likhte rahiye...acha likhte hain aap

vandana gupta said...

waah.........bahut sundar.