Monday, February 8, 2010

तकदीर इतनी तो बेरहम हो मुझ पर

तेरे शहर में कुछ दिन ज़िन्दा रहूं
तेरा इतना तो रहम हो मुझ पर
खुदा का नाम तेरे बाद आये
तेरा इतना तो करम हो मुझ पर

वो दीवार गिरे जो तुमने उठाये हैं
वो आग बुझे जो तुमने लगाये हैं
किसी दिन बारिश हो इस वीराने में
आंखों से इतनी रमझम हो मुझ पर

वो अपने घर में, मैं मैकदे में रहूं
तकदीर इतनी तो बेरहम हो मुझ पर